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पोज़िटिव BACK

हम सभी को अच्छी भावना के साथ उत्तम सलाह मिली है, “पॉज़िटिव रहो, सकारात्मक रहो।” यदि परीक्षा में कम प्रतिशत आए तो पॉज़िटिव रहो, यदि नौकरी चली गई तो पॉज़िटिव रहो, जितनी बड़ी तकलीफ उतना पॉज़िटिव रहने की बात तो ज्यादा ही मुश्किल लगती है। ऐसी परिस्थिति में नेगेटिविटी हावी नहीं हो पाए ऐसी समझ अपने आप नहीं आती। इस गुण का धैर्य से विकास करना पड़ता है। हमारे पास नीरू माँ के रूप में उत्तम उदाहरण है। उन्होंने कभी भी आशा नहीं छोड़ी और मुश्किल संयोगों में भी दादा के जगत्‌ कल्याण के मिशन के लिए पॉज़िटिव रहे। जीवन चकडोल जैसा है। उसमें हमेशा अच्छा ही होगा ऐसी आशा हम नहीं रख सकते। जीवन में विघ्न तो आएँगे ही और हमें दुःख भी होगा। लेकिन यदि हम अपनी शक्तियों और कमज़ोरियों को ध्यान में रखकर सकारात्मकता को अपनाएँगे, तो सब से विकट संयोगों को भी डगमगाए बिना पार कर पाएँगे। दादाश्री कहते हैं कि जीवन में आने वाली परेशानियों से मनुष्य शुद्ध बनता है। भगवान महावीर ने अपने शिष्यों को सिखाया था कि जब वे भिक्षा लेने बाहर जाएँ और कोई उन्हें लकड़ी से मारे, तो सोचें कि, “ये लोग तो सिर्फ लकड़ी से ही मार रहे हैं, हाथ तो नहीं काटा न!” हाथ काट दें तो सोचना, “दूसरा हाथ तो सलामत है न!” कैसी भी कठिन परिस्थिति में भी पॉज़िटिव ढूँढ निकालना, यह सब से बड़ी पॉज़िटिव दृष्टि है। क्या हम जीवन में इसके दसवें भाग का भी उपयोग करते हैं? यदि पॉज़िटिविटी छूत के रोग की तरह फैल गई होती तो हम किसी अलग ही दुनिया के वासी होते। इस अंक में आपको नेगेटिविटी को उखाड़कर, उसकी जगह पॉज़िटिविटी की स्थापना की प्रेरणा मिले इस आशा के साथ।