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शंका BACK

फिर अचानक हमारी समझ में आता है कि, इसके बारे में तो सोचने की भी ज़रूरत नहीं थी और इतनी तकलीफ हम सभी में एक चीज़ समान है कि, हम ज़रा सी बात में डरे रहते हैं और तनाव में आ जाते हैं। की शुरुआत एक ज़रा सी बात पर हो जाती है - शंका। क्या मैं परीक्षा में पास हो जाऊँगा या मुझे नौकरी मिलेगी या मेरी बेटी का किसी के साथ लफड़ा होगा तो क्या होगा? वगैरह। क्या ऐसी कोई चीज़ है कि, जिसके बारे में हम शंका नहीं करते या जिससे हम नहीं डरते? इससे पता चलता है कि, हमें जिस मज़े में और आनंद में रहना चाहिए, उसे हम कितना पीछे छोड़ आए हैं। समस्या में घिरी हुई व्यक्ति के लक्ष्ण ये हैं कि, उसे सभी चीज़ों के बारे में शंका उत्पन्न होती है और उससे डर लगता है। दादाश्री कहते थे कि, “शंका और डर, कॉज़ (कारण) और इफेक्ट (असर) जैसे हैं। शंका के छोटे से बीज से पूरा जंगल बन जाता है। कभी अगर आपके (मन) में शंकाशील विचार आए और थोड़े समय के लिए आते रहें, तो वह सामने वाले व्यक्ति तक पहुँच जाते हैं और उसकी व्यापकता बढ़ती जाती है।” किसी भी व्यक्ति या चीज़ के बारे में शंका करने से पहले हमने ऐसा कभी नहीं सोचा था। इस अंक का विषय यही है कि, शंका न करना योग्य क्यों है और ऐसा नहीं करने के उपाय कौन से हैं! आशा है कि यह अंक आपके जीवन को और भी अच्छा और सुखमय बनाने में मदद करेगा!