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ब्राह्मचर्य BACK

इस बार, हम लहरों की विरुद्ध दिशा में तैरने जैसा एक विशेष अनुभव करने जा रहे हैं। इस अंक में हम “ब्रह्मचर्य” नामक एक शक्तिशाली हथियार विषय के बारे में चर्चा करेंगे, जो कि हमें सांसारिक समस्याओं का मूल ऐसे अब्रह्मचर्य के गहरे गड्ढे में गिरने से रोकता है। हमारी प्राचीन संस्कृति में भी ब्रह्मचर्य के महत्व को प्राधान्य दिया गया है। आश्रम व्यवस्था में (उम्र के अनुसार जीवन को चार भाग में), पहला आश्रम (जन्म से युवावस्था तक की उम्र), ब्रह्मचर्याश्रम (ब्रह्मचर्य आश्रम) कहलाता है। युवावस्था में ब्रह्मचर्य के लिए अनुशासन, मार्गदर्शन और शुद्धता होना आवश्यक है। हर एक धर्म में ब्रह्मचर्य स्वीकार होने पर भी सही ज्ञान के अभाव के कारण हम असहाय होकर असंयम के भँवर में फँस जाते हैं। इस काल के प्रवाह के कारण पूरा दिन अब्रह्मचर्य से संबंधित सामग्रियों का अविरत प्रभाव पड़ता ही रहता है, लेकिन उसमें कुछ गलत है ऐसा कोई सोचता ही नहीं है। अब्रह्मचर्य के परिणाम कितने नुकसानदेह हैं, इससे आज का युवा वर्ग अन्जान है। पूज्य दादाश्री अब्रह्मचर्य को गंदगी का ढ़ेर कहते थे। अब्रह्मचर्य का भ्रामक आनंद भोगने में बड़े-बड़े संत और गुरु भी अध्यात्म के शिखर से गहरी खाई में गिर चुके हैं। यदि युवावस्था में ध्यान, पढ़ाई और करिअर पर केन्द्रित करके, उस ओर पुरुषार्थ किया जाए तो निश्चितरूप से सफलता मिलेगी। इसीलिए ब्रह्मचर्य की प्रचंड शक्ति को पहचानकर अपने हिताहित का ध्यान रखने के लिए हम इस संवेदनशील विषय से संबंधित अनेकों मान्यताओं-गैरमान्यताओं को समझेंगे ताकि युवावर्ग विषय-विकार के भ्रामक आनंद के भँवर में फँसने से पहले एक बार ज़रूर सोचें...