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बुजुर्गों की सेवा BACK

मनुष्य जीवन की सार्थकता किस चीज़ में हैं, क्या हमने कभी ऐसा सोचा है? यश, नाम, कीर्ति, लक्ष्मी कमाने में या फिर और कुछ? अपने अलावा, माता-पिता के प्रति भी हमारा कोई फर्ज़ तो होगा न? माता-पिता, बुज़ुर्गों का उपकार जीवन में कैसे भूल सकते हैं? उस उपकार का बदला कैसे चुका सकते हैं? हर एक धर्म एक ही बात दोहराता है कि इस उपकार का बदला सिर्फ सेवा धर्म से ही चुका सकते हैं। सही अर्थ में मानवता या मानवधर्म यही है कि सेवा के सिंचन से हमारा जीवन प्रकाशित हो और हमसे औरों को सुख मिले। पूज्य दादाश्री कहते हैं कि जीवन में यदि सुखी होना चाहते हो तो सुख की दुकान खोलो। माता-पिता, बुज़ुर्गों को कभी भी भूला नहीं देना चाहिए। इससे भी आगे बढ़कर, प्रेम से, बिना किसी अपेक्षा के सेवा करनी चाहिए। गुरु की, ज्ञानी की सेवा तो शायद सभी को न भी मिले, लेकिन माता-पिता, बुज़ुर्गों की सेवा तो सभी अवश्य कर ही सकते हैं। माता-पिता, बुज़ुर्गों की सिर्फ सेवा ही नहीं करनी है बल्कि उनके दिल को ठंडक पहुँचानी है, उन्हें राज़ी करना है। उनके आशीर्वाद से हमारे काम सफल होंगे, हमें आनंद रहेगा और अंदर से शांति रहेगी। चलो समझें कि इस अंक में माता-पिता और बुज़ुर्गों के बारे में दादाश्री क्या कहना चाहते हैं।