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बनो शाकाहारी BACK

"मैं कौन हूँ" और "वास्तव में इस जगत्‌ को कौन चलाता है" यह जानना ही अध्यात्म कहा जाता है। अध्यात्म, जीवन को समभाव की ओर ले जाता है। अध्यात्म अर्थात्‌ खुद को पहचानकर ऐसा जीवन जीना ताकि एक भी कर्म नहीं बँधे, क्योंकि अच्छे या बूरे कर्म हमें बंधन में डालकर मोक्ष में नहीं जाने देंगे। दादाश्री ने कहा है कि यदि आध्यात्मिक मार्ग पर चलना चाहते हैं तो ३ आदतें संपूर्ण वर्ज्य हैं। शराब या अन्य किसी भी प्रकार का नशा, माँसाहार और तीसरा व्यभिचार (अणहक्क के विषय)। इस अंक में हम माँसाहार से क्यों दूर रहना चाहिए, उसके कारणों को गहराई से समझेंगे। यह भी समझेंगे कि माँसाहार किस तरह से अध्यात्म के लिए बाधक है। हमारे आध्यात्मिक ध्येयों में माँसाहार इतना अवरोधक क्यों है कि दादाश्री माँसाहारियों के मोक्ष की ज़िम्मेदारी भी नहीं लेते? इस अंक में इसे भी समझेंगे। य़ुवाओं के मन में कई प्रश्न हैं, उदाहरण के तौर पर "हमें अंडे खाने चाहिए या नहीं?" "जीने के लिए हिंसा तो करनी ही पड़ती है, तो वनस्पति और प्राणियों के जीवन में क्या फर्क है?" वगैरह। हमें आशा है कि आपको अपने प्रश्नों के जवाब मिलेंगे और शाकाहार लेने की आध्यात्मि अंतर सूझ मिलेगी।