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झगडा BACK

हलो फ्रेन्ड्‌स, हमारे लिए झगड़ा एक सामान्य शब्द है। फ्रेन्ड्‌स और माता-पिता के साथ छोटी-छोटी बातों में झगड़े होते ही रहते हैं। “मैं कहाँ कुछ गलत कर रहा हूँ?“ “मुझे अपनी तरह से जीने का हक है या नहीं?“ ऐसी सोच की वजह से हमने कभी उस ओर ध्यान दिया है कि अपने तरीकें से जीने में जाने-अन्जाने हम कुछ गलत तो नहीं कर रहे हैं न? कभी सोचा है? कोई बात नहीं। इस अंक में आपको ऐसी कई बातों का पता चलेगा जो आपके रुटिन (लाइफ) से जुड़ी होने के बावजूद भी आपके ध्यान में नहीं आई हों और ध्यान में आने के बावजूद भी हमें पता ही नहीं चलता कि अब मैं इसमें क्या करुँ? तो बस, इस अंक में हम से झगड़े किस वजह से होते हैं? झगड़े के परिणाम किस हद तक बुरे हो सकते हैं? झगड़ा होने से पहले, ऐसी कौन सी समझ सेट करें ताकि झगड़े ही न हों? झगड़े के समय ऐसी कौन सी मुख्य चाबी सेट करें ताकि हमें शांति रहे, झगड़ा होने के बाद क्या करें? ये सब जानने मिलेगा। दादाश्री कहते हैं कि, “हमें “झगड़ाप्रूफ“ बन जाना चाहिए। “झगड़ाप्रूफ“ बनेंगे तभी इस संसार में रह सकेंगे। हम आपको “झगड़ाप्रूफ“ बना देंगे। हमारा स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि झगड़ा करने वाला ही ऊब जाए। वर्ल्ड में कोई भी हमें “डिप्रेस“ न कर सके, ऐसा होना चाहिए। हम “झगड़ाप्रूफ“ बन गए फिर झंझट ही नहीं रहेगी न? लोगों को अगर झगड़े करने हों, गालियाँ देनी हो तो भी कोई हर्ज नहीं और फिर भी बेशर्म नहीं कहलाएँगे बल्कि जागृति और भी बढ़ेगी।“ ऐसी अनेक प्रकार की समझ प्राप्त करने के लिए चलो इस अंक का आनंद लें...