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आलस BACK

आपके मंतव्य के अनुसार एक आदर्श दिन कैसा होना चाहिए? सुबह जल्दी उठना, व्यायाम करना, समय पर कॉलेज पहुँचना, अंतिम तारीख से पहले असाइन्मेन्ट पूरे करना, घर के कामों के लिए समय निकालना, ठीक है न? इन सभी कार्यों का महत्व होने के बावजूद भी हम कभी भी इन्हें समय पर पूरा नहीं करते, क्योंकि शायद हम बहुत आलसी हैं। कई बार हम कहते हैं न कि, “मैं ऊब गया हूँ।” कई महान व्यक्तियों ने आलस के दुष्प्रभावों के बारे में समझाया है, फिर भी हमारे समाज में सुस्त और शिथिल व्यवहार हर जगह देखने को मिलता है। इसीलिए हम आलसी हैं, ऐसा मान लेने में हमें कोई संकोच नहीं होता। इतना ही नहीं लेकिन कई लोग तो इसका गर्व करते हैं। फिर भी मुझे पूरा विश्वास है कि एक बार अगर आप आलस के दुष्प्रभाव और इनमें से बाहर निकलने के सरल उपायों को समझ लेंगे, तो कार्य करने की क्षमता होने के बावजूद भी कार्य नहीं करने की वृत्ति में से बाहर निकलने के लिए आप ज़रूर कदम उठाएँगे। दादाजी कहते थे कि “काँटों पर सोए रहने को ऊब कहते हैं।” इस अंक में आलस के विविध पहलू और उनमें से बाहर निकलने के उपायों को बताने की हमने कोशिश की है। यह जानकारी मिलने के बाद आप तय कर सकेंगे कि कौन सा विकल्प योग्य है। उदाहरण के तौर पर देर से पैपर्ज़ सबमिट करके टीचर का गुस्सा सहन करना या समय पर काम खत्म करके उत्पन्न हुए संतोष का आनंद उठाना। आशा है कि इस अंक में दिखाई गई परिस्थितियों को आप अपने जीवन से जोड़कर अपने प्रश्नों का हल प्राप्त कर सकेंगे। जय सच्चिदानंद।