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बदले की भावना BACK

जीवन में हमें छोटे-बड़े, कड़वे-मीठे अनुभव होते ही रहते हैं। व्यवहार में दो प्रकृतियों के आमने-सामने आने पर या तो फूल बरसते हैं या चिंगारी। कुछ ऐसे व्यक्ति भी मिलते हैं कि जिनके बिना जीवन कैसा होता, उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। हम सब ने अनुभव किया ही है कि जीवन में अच्छा समय और अच्छे व्यक्ति कई बार समय के साथ-साथ विस्मृत हो जाते हैं लेकिन कुछ व्यक्तियों द्वारा मिले कड़वे अनुभव हम भुला नहीं पाते। हमने संसार में किसी न किसी व्यक्ति द्वारा चोट खाई होती है। किसी का वर्तन हमें चुभता है तो किसी के शब्द हमें पीड़ा देते हैं। जब कभी परिवार के बुज़ुर्ग हमें उलाहना दें, भागीदार पैसों का घपला करे, दोस्त हमारी कमज़ोरियों का फायदा उठाएँ, पड़ोसी झग़ड़ा करे... तब ऐसे मौकों पर हमारी भावनाओं को ठेस लगती है। इन घटनाओं के परिणाम स्वरूप एक नकारात्मक दृष्टिकोण खड़ा हो जाता है और बदले की भावना उत्पन्न होती है। इस अंक में हम मानव स्वभाव में सहज ही जुड़ी हुई इस "बदले की भावना" को गहनता से समझेंगे, उसके भयंकर परिणामों के बारे में जानेंगे और उसमें से बाहर आने के उपाय समझेंगे। तो चलो, दादा के समझरूपी प्रकाश में हम इस अंक के सफर की शुरुआत करें। जय सच्चिदानंद।