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मोह BACK

प्यारे दोस्तों, “मोह खिलाए मार” यह कहावत तो आप सभी ने कई बार सुनी होगी। लेकिन मोह किसे कहा जाए? नीत नए कपड़े पहनने का, घूमने जाने का, सिनेमा देखने का, होटल में खाने का, टी.वी. देखने का, कम्प्यूटर एवं मोबाइल पर गेम खेलने का, वगैरह, वगैरह... यह सूची तो बड़ी लंबी हो सकती है। ये सब मोह के ही प्रकार हैं और हम मोह के महासागर में डूबे हुए हैं। आपको ऐसा लग रहा होगा कि ये तो हमारी दैनिक प्रवृत्तियाँ हैं, इसे मोह कैसे कह सकते हैं? लेकिन हमारी हर एक क्रिया एक या दूसरे मोह के वश में आकर ही होती रहती है। आश्चर्य की बात तो यह है कि हमें इसका पता तक नहीं चलता। अब जब मोह का ही पता नहीं चलता तो यह तो स्वाभाविक ही है कि मोह कैसे-कैसे मार खिलाता है, उसका पता तो चलेगा ही नहीं। अक्रम यूथ का यह अंक मोह में वश होकर हमें कैसे-कैेसे मार खाने पड़ते हैं, यह समझने का और मोह के जाल में न फँसकर मुक्ति के आनंद में कैसे रहें, ऐसी समझ विकसित करने का एक विनम्र प्रयत्न है...