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भावनाओं को समझो BACK

प्रिय युवा मित्रों, मैं आप तमाम जीवमात्र सुख चाहते हैं। दुःख किसी को भी नहीं चाहिए। फिर भी किसी को भी सुख निरंतर नहीं रहता और यह सुख-दुःख की परंपरा अविरत चलती ही रहती है। इस काल में सुख तो सिर्फ दो दुःखों के बीच के विराम को कहा गया है। क्यों? "जगत्‌ कूएँ के समान है, प्रतिध्वनि स्वरूप है।" ऐसा कई बार सत्संग में सुनने में आता है और इसीलिए ही हम दृढ़ निर्णय-निश्चय से ध्यान रखते हैं कि रोज़िंदा व्यवहार में हमारे संपर्क में आई हुई व्यक्तियों के प्रति हमारे भाव न बिगड़े। फिर भी जाने-अन्जाने हमारे भाव बिगड़ जाते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप नए कर्म बाँधने की श्रृंखला हमारे जीवन में चलती ही रहती है। मित्रों, इस अंक में परम पूज्य दादाश्री ने हर एक क्रिया के पीछे रहे हुए भाव को पहचानकर उसके प्रति जागृत रहकर विपरीत भावों को सुल्टे भावों में बदलने के लिए किस तरह से पुरुषार्थ शुरू करें, उसे विस्तार से समझाया है। यह समझ हर एक वाचक मित्र के लिए उपयोगी साबित होगी ऐसी आशा के साथ.... जय सच्चिदानंद।