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कलम-२ किसी भी धर्म का किंचित्मात्र प्रमाण न दुभे BACK

प्यारे दोस्तों, अक्रम यूथ की नौ कलमों की श्रृंखला के इस अंक में हम दूसरी कलम को विस्तार से समझेंगे। “धर्म” शब्द के अलग-अलग अर्थ कहे गए हैं। किसी भी वस्तु के स्वाभाविक गुणों को उस वस्तु का धर्म कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर अग्नि का धर्म उसकी गरमी और तेज है। जबकि शास्त्रों में तो वेदों में बतलाए गए शुभ कर्मों को धर्म कहा गया है। हम अगर प्राचीन अर्थ देखें तो धर्म अर्थात्‌ जीवन जीने का न्यायपूर्ण और कर्तव्यपूर्ण तरीका। परम पूज्य दादा भगवान इनमें से किस धर्म की बात कर रहे हैं, ऐसा प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इस अंक में हम धर्म की नई ही परिभाषा और सभी रिलेटिव धर्मों के बारे में परम पूज्य दादा भगवान क्या कहना चाहते हैं और जाने-अनजाने किसी भी धर्म का प्रमाण हम से कहाँ-कहाँ दुभ जाता है, यह समझेंगे। साथ ही ऐसी गलतियाँ न करने की चाबियाँ प्राप्त करेंगे और दूसरी कलम द्वारा ऐसा निश्चय करेंगे कि दोबारा कभी भी हमसे किसी भी धर्म का किंचित्‌मात्र भी प्रमाण न दुभे। करेंगे न? -डिम्पल मेहता