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कलम - 3 किसी भी उपदेशक, साधु-साध्वी या आचार्य का अवर्णवाद, अपराध, अविनय न करें BACK

प्रिय मित्रों, यह हमारी "भावना से सुधारे जन्मोंजन्म" श्रृंखला का तीसरा अंक है और मुझे विश्वास है कि मेरी तरह आपने भी रोज़ परम पूज्य दादा भगवान की नौ कलमें बोलना शुरू कर दिया होगा और उससे काफी हल्कापन महसूस हो रहा होगा। पिछले दो अंकों में हमने किसी भी व्यक्ति के अहम्‌ या विविध धर्मों से संबंधित होने वाले दोषों और ऐसे दोष न हो उसके लिए जागृति रखने की समझ प्राप्त की। अब इस अंक में तीसरी कलम के बारे में विस्तारपूर्वक समझेंगे जिसमें दादा भगवान ने धर्मगुरुओं के प्रति होने वाली गलत भावनाओं के लिए शक्तियाँ माँगने के लिए कहा है। हर एक को खुद जिस व्यू पोइन्ट पर खड़ा है वही व्यू पोइन्ट सही लगता है। जब तक खुद उसे सही मानता है जब तक हर्ज़ नहीं है लेकिन जब अन्य सभी व्यू पोइन्ट वालों को गलत मानता है तब दोष लगता है। बालमंदिर से पी. एच. डी. तक के अभ्यासक्रम में हर साल गुरु बदलते रहते हैं न? हम कौन सी कक्षा को गलत कहेंगे? अब अगर कक्षा गलत नहीं है तो उसके गुरु को भी गलत कैसे मान सकते हैं ? दादा भगवान ने हमसे जो दो डिग्री आगे हैं उनके प्रति भी विनय रखने के लिए कहा है। हमारा भी भाव ऐसा ही है कि विनय में ही रहना है, फिर भी ऐसे दोष कैसे हो जाते हैं। इस अंक में वही बात की गई है और यह आप सभी के लिए उपयोगी होगी ऐसा मुझे विश्वास है। -डिम्पल मेहता