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कलम ६- किंचितमात्र भी विषय-विकार संबंधी दोष, इच्छाएँ, चेष्टाएँ या विचार संबंधी दोष न किए जाएँ BACK

प्यारे मित्रों, क्या आप जानते हैं कि हर एक जीव चार संज्ञाओं के साथ जन्म लेता है? आहार, भय, मैथुन (विषय) और निद्रा (नींद)। इन चार में से तीन संज्ञाएँ तो बचपन से ही अपना स्वभाव दिखाती हैं। तभी तो चाहे छोटा बच्चा हो या हमारे जैसे युवा हो, सभी को भूख लगती है, नींद आती है और कुछ संयोगों में भय (डर) भी लगता है। सिर्फ एक मैथुन संज्ञा जवानी में कदम रखने के बाद अपना प्रभाव दिखाना शुरू करती है। इसी वजह से युवक और युवतियों को एक-दूसरे के प्रति आकर्षण होने लगता है। विषय के अलावा अन्य तीन संज्ञाओं का जोख़िम ज्यादा नहीं है लेकिन इस विषय के विरूद्ध और खासतौर पर अणहक्कके विषयों के जोख़िम भयंकर होने के कारण उनके विरूद्ध बहुत ही जाग्रत रहने के लिए दादा भगवान ने बार-बार चेतावनी दी है। शादी से पहले, विषय-विकार संबंधी कुतूहलता, विकृत वृत्तियों और चेष्टाओं में बदल जाता है और इसका हमें पता तक नहीं चलता। अणहक्क के विषय विकारी दोषों के परिणाम कितने भयंकर होते हैं उसकी अज्ञानता के कारण हम इस कीचड़ में और भी धँसते चले जाते हैं। परम पूज्य दादा भगवान द्वारा दी गई नौ कलमों में से छठवीं कलम का आराधन करने से इन भयंकर विषय संबंधी दोषों से मुक्त होने की और इनसे दूर रहने की समझ और शक्ति मिलती है। प्रस्तुत संकलन में छठवीं कलम और विषय-विकारी दोषों की विस्तृत जानकारी एवं उनमें से बाहर निकलने की समझ दी गई है। मुझे विश्वास है कि आप सभी के लिए यह अंक विषय संबंधी दोषों के विरूद्ध निरंतर जाग्रत रहकर इसमें से बाहर निकलने का पुरुषार्थ शुरू करने के लिए एक बड़ा प्रेरकबल बनेगा। ऑल द बेस्ट। फिर मिलेंगे अगले महीने, नई कलम, नई समझ के साथ... जय सच्चिदानंद!!!