Share
कलम ८- किसी भी जीव का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष, जीवित अथवा मृत, किसी का किंचित्तमात्र भी अवर्णवाद, अपराध, अविनय न किया जाए। BACK

टी.वी. देखते समय, खेलते समय, दोस्तों के साथ हँसी-माज़ाक करते समय या अन्य किसी भी परिस्थिति में व्यक्तियों के बारे में कुछ न कुछ अभि्ाप्राय बँध जाते हैं। ज्यादातर यह अभिप्राय और उससे निकली हुई वाणी, दोनों नकारात्माक ही होते हैं। इनमें से कुछ व्यक्ति तो जिंदा भी नहीं होते और ज्यादातर व्यक्ति जैसे कि देश-विदेश के नेता, अभिनेता/अभिनेत्री, खिलाडी़, वगैरह जिनसे हम कभी मिले भी नहीं हैं, हमारे पास उनकी कोई व्यक्तिगत जानकारी भी नहीं है, फिर भी लापरवाही से उन पर कई तरह के दोषारोपण कर देते हैं। इसके अलावा करीबी व्यक्ति, रिश्तेदार, दोस्त, शिक्षक वगैरह के लिए भी उनकी गैरहाजि़री में निंदा-कूथली कर देते हैं। इसे कलयुग का प्रभीव कहें या मनुष्य का प्राकृतिक दुगुर्ण लेकिन छोटे से लेकर बडे़, सभी के व्यवहार में यह एक बुरी आदत सामान्य तौर पर देखी गई हैं। दोस्तों, आश्चर्य की बात तो यह है कि ऐसा अविरत चलता ही रहता है और अनजाने में ही दिन-रात हम अगले जनम के लिए अधोगति के बीज बो देते हैं। अक्रम यूथ के इस अंक में परम पूज्य दादा भगवान द्वारा दी गई नौ कलमों में से आठवीं कलम की विस्तृत समझ प्राप्त करें ताकि ऐसी भूल कहाँ-कहाँ करते हैं वह हमें पता चले और इस बुरी आदत से बाहर आ सकें। उसके लिए शक्तियाँ माँगेंगे। - डिम्पल मेहता