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अपनी गरज से मोक्ष में जाने वाले कैसे होते है ? BACK

युवा मित्रों, जीवन में जब हम किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति से मिलते हैं तो उनके किसी न किसी गुणों से प्रभावित और आकर्षित हो जाते हैं। और नियम ऐसा ही है कि जो गुण हममें न हो तो और सामने वाले व्यक्ति में वे गुण हो, तो उस व्यक्ति के प्रति स्वाभाविक रूप से आकर्षण हो ही जाता हैं और उन्हें देख-देखकर ही हममें भी उन गुणों का विकास होने लगते हैं। तो चलिए इस अंक में हम एक प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का परिचत प्राप्त करते हैं। ज्यादातर ज्ञानी पुरुष और भगवंत तो आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करके उसी जन्म में निर्वाण पद की प्राप्ति कर लेते हैं। बहुत कम ऐसे प्रसंग देखे गए हैं जैसे कि महावीर भगवान 42 वर्ष की आयु में केवलज्ञान प्राप्त करके 72 वर्ष तक विचरते रहे। कृपालुदेव आत्मज्ञान प्राप्त करके कम उम्र में ही विदा हो गए और बहुत कम लोग उनके संपर्क में आ पाए। दादाश्री को 1958 में अक्रम ज्ञान प्राप्त हुआ। और 32 वर्षो तक ज्ञान बाँटते रहे। दादाश्री के कृपा पात्र नीरू माँ, दादाश्री से ज्ञान प्राप्त करके निरंतर 38 वर्षो तक अक्रम झंडा फहराते हुए हमारे बीच रहे। और हम सभी के लाडले पूज्यश्री 17 वर्ष की उम्र में दादा से ज्ञान प्राप्त करके, पूज्य नीरू माँ के सहाध्यायी रहे, पिछले 50 वर्षो से दादाश्री के सूत्रधार के समान, हमारे बीच आज प्रत्यक्ष हाज़िर हैं। हम सब बहुत भाग्यशाली हैं कि हमें ‘50th गोल्डन जुबली ज्ञान वर्ष’ मनाने का अलौकिक मौका मिला है। ‘अपनी गरज से मोक्ष जाने वाले कैसे होते है?’ उसे देखने का और देख-देख कर सीखने का सुदंर अवसर हमें मिला है। युवा मित्रों, इस महीने का अक्रम यूथ का अंक भी आप सभी के लिए विशेष प्रेरणा लेकर आया है। तो चलो, इस अंक द्वारा हम पूज्यश्री दीपकभाई के जीवन के दिव्य प्रसंगों से “मोक्षमार्गी कैसे होते हैं?” उसकी झांकी करवाने वाले विविध प्रसंगों को हम याद करते रहेंगे ताकि हमें पुरुषार्थ करने की नई द्रष्टि मिले और हम भी ज्ञानी पुरुष द्वारा अनुभव किए हुए और निर्देशित मार्ग पर आगे बढ़ सकें। - डिम्पल मेहता।