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स्पर्धा BACK

प्रिय पाठक मित्रों, स्पर्धा कहाँ नहीं होती? बचपन से लेकर अब तक जीवन में हर कदम पर स्पर्धा चलती ही रहती है। बचपन में खिलौनें के लिए स्पर्धा, बड़े होने पर पढ़ाई के लिए। फिर अच्छा दिखने के लिए, करियर के लिए, जॉब में प्रमोशन के लिए या फिर सोसाइटी में स्टेटस के लिए स्पर्धा चलती रहती है। दूसरे से आगे निकलने के लिए, अपने आपको दूसरों से ज्यादा होशियार साबित करने के लिए या फिर दूसरों के मुकाबले अपना इम्पॉरटन्स बढ़ाने के लिए निरंतर स्पर्धा चलती ही रहती है। आगे जाकर स्पर्धा में से ईर्ष्या का जन्म होता है और फिर अंतहीन पीड़ा उठानी पड़ती है जिससे कई बार तो बैर भी बँध जाता है। और फिर अंत में आनंद चला जाता है, सही है न? मित्रों, कई बार हमें ऐसा लगता है कि मैं तो स्पर्धा करता ही नहीं हूँ। तो यह अंक अवश्य पढ़ें। इस अंक में एक वेब स्टोरी के एपिसोड द्वारा हम स्पर्धा में कैसे और क्यों पड़ जाते हैं ? उसके लक्षण क्या हैं ? उससे क्या नुकसान होता है ? यह समझेंगे और साथ ही साथ स्पर्धा से कैसे बाहर निकल सकते हैं इसकी प्रैक्टिकल समझ भी हम प्राप्त करेंगे। - डिम्पल भाई मेहता