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लोग क्या कहेंग? BACK

प्रिय पाठक मित्रों, जीवन में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जो हमें दुविधा में डाल देती हैं और मन में कई प्रकार के प्रश्न उठ ने लगते हैं जैसे कि जो मैं कर रहा हूँ वह सही तो है ना? मैंने जो फील्ड पसंद किया है उसमे मैं सफल नहीं हुआ तो? मैं जो कर रहा हूँ वह मुझ दुनिया से अलग तो नहीं कर देगा? ऐसा बहुत कुछ मन में चलता रहता है, खास तौर पर आपके जैसी युवा अवस्था में। जानते हो इन सभी सवालों का मूल कारण क्या है? नहीं ना? तो चलो, मैं आपको बताता हूँ। इन सभी का मूल कारण है, एक ही डर - “लोग क्या कहेंग?” लेकिन मित्रों, सभी महान पुरुषों का जीवन चरित्र अगर पढ़ोगे ना, तो लगभग सभी में एक खूबी तो एक समान ही मिलेगी और वह खूबी है - अपना ध्येय सिद्ध करने के लिए दृढ़ निश्चय के साथ पुरुषार्थ करना। यदि उन्होंने “लोग क्या कहेंग?” को प्रधानता दी होती तो वे कभी भी अपने जीवन में सफल नहीं हो पाते। “लोग क्या कहेंग?” नाम के काल्पनिक भय से मुक्त जीवन में अपने ध्येय के रास्ते पर आगे बढ़ सको उसके लिए अक्रम यूथ का यह अंक आपके लिए एक आधार स्तंभ बनकर आपको उचित मार्गदर्शन प्रदान करेगा ऐसा मुझे विश्वास है। - डिम्पल भाई महेता